शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

बारेलाल छीपा......




बचपन में  इनसे खासी मुलाकातें होती रहीं उम्र का अंदाज़ नहीं लगता था देह साठ पार बताती थी लेकिन कारनामें चालीस से ऊपर की इजाज़त न देते थे ! क्योंकि , तब की याददाश्त में उनके यहाँ एक नवजात भी था ! जिसके पिता होने का दावा वे करते रहते थे ! लगता है बीडी के धुएं ने उनकी मर्दानगी के साथ-साथ चेहरे से युवा होने के भाव भी चूस लिए ! बारेलाल के पडौसी रात को निश्चिंत होकर सोते , क्योंकि रात भर की खंसाई से मुफ्त में पहरेदारी हो जाती ! इसीलिए ठाकुर राधे सिंह अपनी बकरी को यूँ ही छोड़ देते ! बारेलाल छीपा बीडी के धुएं का गुबार ऊपर और नीचे से विसर्जित करते हुए अपने पूर्वजों को मुगलों के समय का रंगरेज़ बताते हैं ! वो तो बस नहीं चला नहीं तो कह देते की शाह्जान का अंगरखा और अनारकली की चोली भी वे ही रंगे थे ! बारेलाल की साँसे रेल इंजिन की आवाज को मात देती थी , नव युगल प्रेमी-प्रेमिका भी ऐसी सांस से थर्रा जाएँ , कारण अज्ञात था ! लेकिन वैज्ञानिक शोध इसके पीछे उनके फेफड़ों में हुआ संक्रमण बताते !

बारेलाल अपने पुश्तेनी व्यवसाय में नहीं थे वल्कि कभी राजगीरी या हम्माली जैसे काम में लगे रहते थे ! लेकिन माता , बाबा , धर्म , टोटका , भूत -प्रेत  , जिन्न-जिन्नात सब पर बड़ा भरोसा करते ! चूँकि बात अपने बचपन की है सो उनके बुढापे का लिहाज़ रखते हुए  कभी प्रतिरोध नहीं किये ! बारेलाल पक्के देवी भक्त थे , माँ काली की सवारी आने का दावा करते जय कार बुलते ही माता साक्षात आतीं और जो चाहें बुलबा लेती ! बारेलाल के अवचेतन में अंग्रेजी न सीख पाने की कुंठा थी सो कुछ अंग्रेजी सीखने की कोशिश ज़ारी रहती ! इसलिए जैसे ही बारेलाल पर माता आते ही सबसे  पहले प्रश्न पूछती, हू आर  यू ? माता को अंग्रेजी बोलते देखना बड़ा ही आश्चर्यजनक रहता ! लेकिन अपने समसामयिक अनुभवों के अलावा जैसे ही कोई प्रश्न दागा जाता  माता तुरंत  गायब हो जाती ! माता जब शरीर छोडती बारेलाल अचेत हो जाते ! एक बार इसी अचेतावस्था में मैंने बारेलाल को चुटकी  भर ली अचानक चेतना आ गयी जिसे आने में अक्सर टाइम लगता था ! एक बार मैंने उन्हें बीडी देते हुए इस का राज़ पूछा, बोले माता तो हमेशा शरीर में रहती हैं लेकिन आती सिर्फ सच्चे भक्तों के सामने ! में समझ गया जो अनर्गल प्रश्न पूछते हैं वे सच्चे भक्त हो ही नहीं सकते !!!  जय हो

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

त्रिलोकी नाथ की रजाई ...

.

त्रिलोकी नाथ , भैया नाम पर मत जाईये ये तो अभी १ इंच जमीन के भी नाथ नहीं है , परिवार से बनती नहीं और गृहस्थी जुडती नहीं ! शक्लो सूरत भी ऐसी की स्वयं कई बार कमबख्त शीशा भी चूर होते बचा ! बढती दाड़ी पर कभी-कभी हाथ साफ़ कर लेते थे सो उस दिन लगता की आज नया अवतार हुआ है , नहीं तो त्रिलोकी लंका के सैनिक से दिखाई देते , जैसा कि कुछ नाटकों में देखा ! त्रिलोकी भेद विज्ञान के माहिर
 खिलाड़ी थे मेरा -तेरा सब जानते थे लेकिन उनका अपना सिद्धांत यह था कि जो मेरा है सो मेरा ,और जो तेरा है वो भी मेरा है ! त्रिलोकी को रात बिरात शादी के सपने बहुत आते , और इसी में सुख पा लेते ! पता नहीं कितनी सिलवटें इन्होने अपने जतन से बनाई ! इस मामले में जवान जान पड़ते थे ! वे अक्सर किसी फिल्म का ज़िक्र कर कहते जैन साहब , एक सुन्दर बड़ा सा घर हो और उसमे सीडियों से सफ़ेद कपड़ों में उतरती कोई सुन्दर सी लड़की हो ! नीचे फव्वारे लगे हों , उसमे बैठा जाए , तब जीवन का आनंद आये !बताईये इस त्रिलोकी को जीवन आनंद इस द्रश्य में झलक रहा था ! मैंने पूछा आएगा कहाँ से ये सब ?? तो बोले अरे फिल्मों होता है न सो बम्बई चले चलेंगे ! त्रिलोकी तर्कपूर्ण उत्तर से हम लोगों को निरुत्तर कर देता था !

त्रिलोकी जाड़े में जडाकर रातों-रात चिड़िया बनते-बनते रह गए ! उन्हें यह मालुम था कि अविवाहितों में ज्यादा गर्मी रहती है ! विज्ञान के किस सिद्धांत के आधार पर उन्होंने यह धारणा बनाई यह तो नहीं कह सकते , लेकिन वे अपने ज्ञान पर अटल थे ! एक कानियाँ बाबा उनके इस ज्ञान को और सम्रद्ध कर रहे थे ! सो एक बार कि बात है कि वाजीकरण के नुस्खे का गुप्त फार्मूला तयार कर औषधियों और मेवों को खूब घोंटा ! और दूध के साथ गरमा कर चढ़ा लिए चूँकि रात नहीं गहराई थी सो ठंडक नहीं बढ़ी थी , टी. व्ही. देखते-देखते चटाई पर ही पसर गये ! रात बढ़ते-बढ़ते ठण्ड का प्रकोप बढ़ा त्रिलोकी और सिकुड़ गए धीमे-धीमे सांप की कुंडली के समान जकड गए घरवालों ने सुबह देखा , तो त्रिलोकी इठे पड़े थे , विल्कुल निर्जीव से मानो भेद विज्ञान ने आत्मा और शरीर के भेद को जान लिया ! आनन् -फानन में उपचार शुरू हुआ और त्रिलोकी रजाई का कबच धारण कर लिए ! त्रिलोकी ने स्पष्ट किया कि ये सब इसलिए नहीं हुआ कि हमें ठंड लग गयी बल्कि , इस लिए हुआ कि नुश्के में एक चीज़ मिलाना भूल गए !

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

बलबीर भैया तेरी बलिहारियाँ .....


बलबीर भैया तेरी बलिहारियाँ .....

बलबीर भैया को धरती रोंदते हुए लगभग २९ साल हो चुकें हैं , इनका भोगोलिक विन्यास यही कोई ४ फीट ७ इंच के आस-पास होगा ज्यामितीय निर्धारण थोड़ा सा कठिन जान पड़ता है लेकिन हाँ अंकगणित रूप से पूरे आदमी ही जान पड़ते थे ! बलबीर भैया का मानना था कि उनके पुरखे राजस्थान के रजवाड़े से थे सो इस भ्रम को ताउम्र बनाए रखने के लिए एक नुकीली मूंछ धारण किये हुए थे ! लेकिन मूंछ का मर्दानगी से कोई संवंध कभी वे सीधे ही स्थापित नहीं कर पाए सिवाय इसके कि ये तो राजपूतानी शान है !  खैर ,बलबीर भैया मादाओं में चक्षु परित्यक्त थे , कहते हैं कि एक बार नवरात्रि उत्सव के दौरान देवी दर्शन करते -करते इतने भाव-भिवोर हो गए कि स्वयम को त्याग कर परकाया प्रवेशी बने जा रहे थे ! वो तो भला हो उन तांत्रिकों का जो परकाया प्रवेश का अबूझ ज्ञान सार्वजनिक नहीं था नहीं तो पता नही क्या कर बैठते ! हाँ, उसके बाद उनकी तंद्रा भंग करने के लिए लात-जूते चले तब वापिस इहलोक दर्शन कर सके बलवीर भैया ! सबेरे-सबेरे मुहं सुजाये रेलिंग पर चिपके थे स्कूली टाइम था , जब पूछा क्या हुआ ?? मासूमियत से बोले अरे जैन साहब बस कल थोडा गाडी भिड़ा लिए थे ! बलबीर भैया अलमस्त शौक़ीन थे , कमरे में हर वह सामान अंकित था जिसे ये अवचेतन मष्तिष्क दवाए बैठा था ! मसलन , पुरानी दिव्या भारती  एक जोड़ी करिश्मा , ऐश्वर्या की मुखाकृति , कमल सिद्दू  का फुलाफुल पोज एकाध अंग्रेजी टाईप की भी , B M W , फेरारी , हयाबुसा और हाँ एक व्हाइट हाउस भी था ! मजे की बात यह थी कि वे ये सब इच्छाएं भगवन के बिना पूरी करना चाहते थे ! क्योंकि उनके कमरे में भगवान् की छोटी बड़ी , आधी-अधूरी कोई  भी तसवीर मौजूद नहीं थी ! इस मामले में वे मार्क्स को भी अपना शागिर्द बनाए  हुए थे !

    बलबीर भैया बहुत कर्मनिष्ठ  समाजसेवी हैं! सो सुबह से शाम तक बिना फल की इच्छा किये हुए लगातार कन्या रक्षण हेतु स्वयं स्कूल से घर तक घर से स्कूल तक इस सेवा को निशुल्क उपलव्ध कराते इसमें कोई विभेद न था, सब उनकी अपनी ही थीं ! आज एक तो कल कोई और इस प्रकार वे इस सेवा दौर में अपनी इच्छाएं भी तृप्त कर परम सुख प्राप्त कर लेते थे ! इस मामले में वे नेताओं से कमतर तो न थे , जो सेवा करते -करते ही स्व कल्याण कर लेते हैं ! प्रसंगवस पूछ बैठे कि बलबीर भैया शादी - वादी का इरादा है कि नहीं ?? बड़े प्यार से बोले , भैया क्यों अपराध कराते हो आज सडक पर लड़कियों का चलना दूभर हो गया है , अगर उनकी रक्षा नहीं कर सके तो धिक्कार है ! और इस सेवा कार्य में शादी नाम का रोड़ा न फसाओ ....! अचानक उनकी निगाह बरबस ही ३६० डिग्री पर घूम रही थी वे रक्षण के लिए तयार थे ....! इसीलिए कहा गया है कि जो रक्षा करने का संकल्प रखते हैं वे ही तो राक्षस हैं ! रक्ष: स: इति राक्षस: .....! जय हो बलबीरे जीते रहो

रविवार, 2 दिसंबर 2012

खिंचे-खिंचे से तेजाबी लाल ....



ठंड की सुबह में सब जड़ हो जाता है मन , मष्तिष्क , और ये स्थूल काया भी ! और उस पर भी किक मारू दुपहिया हो तो बस कहने ही क्या , उसे जगाते-जगाते खुद हांफ जाते हैं, तब वे वायु विसर्जन कर किकियाते हैं और बस डगडगाते हुए चल पड़ते हैं ! ऐसा ही एक बेशकीमती दुपहिया अपने पास है जो अक्सर रूठा -रूठा सा रहता है ! बिलकुल स्वामी जी की तरह सब कुछ स्वयंभू ...! पडौसी तेजाबी लाल , ये इनका वास्तविक नाम नहीं था असली मुझे भी नहीं मालुम लेकिन उनकी फितरत को देख कर असली नाम जानने की इच्छा भी नहीं हुयी अक्सर पिच्च्च..पिचकारी मानकर असली पान खब्बुआ होने का साक्षात भान करते अक्सर हम मति भ्रम का शिकार होकर उन्हें कृष्णावतार में देखते और वे  मुझ अर्जुन को ज्ञान देते - ये दांत , शरीर , पैसा,  सड़क .. क्या है तुम्हारा जो झन्ना रहे हो सब नश्वर है , जड़ है ..भूल जाओ ,आओ पान की जुगाली करो में तुम्हें उसमे मिल जाऊंगा ! मुझे व्यर्थ ही इधर-उधर ढूंढते हो ...! उनका ज्ञान दान ने मुझे भी झटका दे दिया ...! खेर तेजाबी लाल , बड़े ही घरेलू किस्म के इंसान हैं , आम लोगों की तरह सामाजिक परजीविता भी विद्यमान है ! वे एकपक्षीय सहकारिता के घनघोर समर्थक थे ! ऐसा कोई मोहल्लेदार या सगे वाला नहीं था जो उनकी इस सहकारिता में नहीं आता हो ! इस मामले वे लगभग सब को एक नज़र से देखते थे ! मकान मालिक से लेकर हर छोटे- बड़े सब उनके इर्दगिर्द मंडराते लेकिन वे चक्मादारी में इतने सिद्धहस्त थे की नेता  जैसे लोगों को भी मात देते थे ! उनका अपना दर्शन था कि चार्वाक हमसे पहले थे और उनके सिद्धांतो का अनुसरण उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है ! इस चार्वाकी सिद्धांत के प्रसार में इतने डूब गए की कब वे लोगों की निगाहों से उतर गए पता नहीं चला ! इस पर उनका अपना मानना था कि, पता नहीं लोग चार्वाक को इतना गलत क्यों मानते हैं ! आखिर समाजवाद , साम्यवाद जैसे विचार इतने बुरे तो नहीं ! खैर ,  वे हर फ़िक्र को पीकते चले जाते थे ! आज सुबह -सुबह टकरागये , बोले बड़ी ऊंची जुगाड़ है , मजेदार काम है लाखों का खेल है बस शुरू में थोड़ी सेटिंग बैठानी है ! मैं कुछ समझा नहीं बोले , दो हज़ार कि व्यवस्था करा दो ..मॉल कमवा दूंगा ! हम अब तक खुद को मुफलिसी कि हीनता से ग्रसित मान रहे थे चेहरे पर संतोष उभर आया कि चलो इस महंगाई में जहाँ पैसा संवंधों और जान से ज्यादा प्यारा हो रहा है , वहां इस वन्दे ने कम से कम इस योग्य तो समझा कि मेरे पास दो हज़ार भी हो सकते हैं ! लेकिन तेजाबी लाल के कारनामों से मोहल्ला परिचित था सो हिम्मत नहीं जुटा सका ! फिर भी मैंने उन्हें आश्वासन दिया  कि बताता हूँ ! तेजाबी पिच्च्च ने पैर के पास टोकन सा चिपका दिया और कहा चलो अब दो की व्यवस्था और रह गयी है सो और देख लेतें हैं .....! फिर धीरे से मन ही मन में बोले साले दिखाई तो बड़े टिप टॉप देते हैं , और दो हज़ार में टें हुयी जा रही है !  अब उन्हें कौन बताये कि देश की अंदरूनी हालत मनमोहन जी जानते हैं और घर की माली हालत हम ..अगर डेकोरम न हो तो कौन पूछे कि लाल भुज्जकड़ कौन ????

शादी की पटकथा .......



शादी का भयंकर जाम वाला सीजन चालू हो गया है ..! सब व्यस्त हैं ननद समेटने में , भौजाई चपेटने में , सास छुपाई में , भैया बचाई में ..कहीं भी भौतिक बेगानापन नहीं ! बिलकुल अपनापन निर्जीव वस्तुओं पर जीवंत रिश्तों की कीमत पर ! हर जगह गणना..कितना कौन बचा ले जाए ?? शादी के माहौल का अपना ही मज़ा है , कुछ बाकये आपको ज़रूर चौंका जाते हैं ! ओ,माईईईई गॉड..पप्पू को देखो मेकओवर चिनाई ही नह
ीं आ रहे है क्या बाल , क्या गाल, और क्या चाल ?सब बदल गए पप्पू को बुलाएं तो वे खुद को ही भूल रहे थे तब याद पड़ा अरे ये तो आशीष भी कहे जाते हैं .. तभी पकड़ में आये ! और पप्पी इन्हें तो दिन में भी कोई सामान्य विकल्प में नहीं रखता है आज बड़ी ही व्यस्त दिख रही है ! थोड़े ठीक ठाक लोगों के अलावा जो वर्ग था वो बरबस ही पप्पी के लिए आतुर था ! करना क्या है आँखों से शिकार ही तो करना है .. ! कौन सा वन्य जीव अधिनियम लगा जा रहा है पता नहीं कितने तीर लगातार बहुत सी पप्प्यिओं को लग रहे थे और पप्पी भी मन ही मन खुश हो रहीं थी ! अरे ये बेचैन सा आदमी , ओह्ह बिटिया का बाप पक्का ..ये लक- दक महिला जो सब कुछ दिखाने को आतुर पक्का बिटिया की मम्मी .. ! आंकलन गलत नहीं था , बुझे हुए चहेरे बाले कौन साहब हैं अरे चाचाजी ही हैं अच्छा खेत का विवाद यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ रहा उफ्फ्फ्फ़ , मुहं फुलाए फूफा जी ..लगता है मान मनौव्वल कोई कमी रह गयी निर्जीव से बैठे ये शख्स कौन लगता है दादाजी हैं , इन्हें कोई नही पूछ रहा ! बिलकुल पुराने रेडिओ की तरह चुपचाप कोने में दुबके बैठें हैं ....एक बुढ़िया की निगाहें लगातार किसी को खोज रहीं थी ..ओह्ह दादी जी लगता है दादाजी को तलाश रहीं है, खाना खाया क्या?? ये रोबीला गबरू जो अपनी उम्र को छुपाने की भरसक कोशिश कर रहा है कौन है भाई ?? अच्छां, समधी जी इनसे बड़ी छाती बाला तो कोई हो नहीं सकता ... लड़का पैदा करने का पुनीत कर्तव्य जो इनके हिस्से आया था ...., खैर अपन लपक के कुकुर भोज में चिपके और इठलाती इमरती पर हाथ साफ़ कर निकल लिए , और हाँ बिल चुकाना नहीं भूले , जिसे लोग व्यवहार कह रहे थे !!!

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

दुलहनिया पाए संतोष भैया .....


दुलहनिया पाए संतोष भैया .....

संतोष भैया , इन्हें ' दादुर' भैया कहने में कभी कोताही नहीं वरती! वे इसे प्यार का संवोधन  मानते थे , 'दादुर' कहने का  अपना निहितार्थ था ! वे अक्सर बरसात  के दिनों में ही लोगों के कमरे पर जलपान या  आहार  के लिए प्रगट होते थे ! छात्रावासी जीवन में वे अक्सर हमलोगों को प्यार से वे 'कुकुर' बुलालेते थे ! इसमें उन्हें बड़े ही अपनेपन का अहसास होता था और हम लोग भी उनका कोई भ्रम नहीं तोडना चाहते थे ! लेकिन वे बहुत निकटता की परिधि में कभी आ नहीं सके पता नहीं क्यों ?? संतोष भैया की उम्र लगभग हम लोगों के  बराबर ही थी , यही कोई इमरजेंसी के एकाध वर्ष पहले की शायद भादों का महीना भी रहा  हो ! संतोष भैया जब अध्ययन के लिए आये तब खासे किशोर थे युवा होने की तयारी में थे मूंछे आने का असफल  प्रयास  कर   रहीं थी लेकिन संतोष भैया उनकी छटाई कर देते सो चिरकालिक किशोर से दिखाई देते ! एक बार गलती से केंची का संगम मूछों और दाढ़ी से न हो सका सो रातों रात युवा हो गये ! शहर की हवा में सुरती का सुख भी पा गये ! लगता है की कटनी से एकाध ट्रक चूना तो इनकी गालों की सफाई कर गया होगा ! लेकिन मुख धवलता नदारद थी दन्त पंक्ति , मुरम की लालामी को मात देती थी ! संतोषी सदैव सुखी होतें हैं ये इन्हें देख कर कभी लगा नहीं , सदैव व्यग्रता विद्यमान रही जो शायद इनके विकास की इच्छा दर्शाती थी !
दादुर भैया में बड़ा आदमी बनने  की उत्कट  इच्छा हम लोगों के समान ही थी ! सो इसी  प्रयास में सिविल सेवा  की तयारी प्रारंभ कर दी ! राष्ट्रसेवा का इस से बेहतर विकल्प सिर्फ नेता गीरी हो सकता था लेकिन परिवार कोई ऐसा हाथ रखने वाला नहीं था , सो इस इच्छा को पाल न सके ! बस ले देकर सिविल सेवा ही बची थी सो कूंद पड़े तन और मन से ...!

                                      उम्र बढ़ते-बढ़ते वे प्रांतीय सेवायों की और झुक गए और उम्र बढ़ी  तो हम लोगोंका साथ छूटने  लगा लेकिन वे ठौर से नहीं डिगे ! प्रांतीय सेवायों से गुजरते हुए शिक्षक भर्ती, कांस्टेबल भर्ती , फ़ूड इन्स्पेक्टर , और इसी प्रकार की नाना सेवाओं  की इच्छा पाले प्रौढ़ वय के तार से जुड़ने लगे !अंकल   शब्द अक्सर उन्हें सुनाई  देने लगा ! घरवाले   भी कन्नी   काटने  लगे , बाल भी साथ छोड़ने लगे इसी उतार चड़ाव के दौर के अंतिम क्षणों में निजी बीमा कम्पनी के अभिकर्ता बन गए ! साहेब से कम न लगाते थे, खुद को  ! किरायेदारी का कमरा अब तक नहीं छोड़े थे ...! और इसी पूरे उपक्रम में शादी की बात भी चल निकली ! विकल्पों का अभाव था सो प्रस्ताव तुरंत लपक लिए , भरी गाडी में टूटी सीट भी सुख देती है इस भाव को संतोष भैया से बेहतर कौन जान सकता था ! कार्ड छपे एक कार्ड हम जैसे कुकुरों का सांझा करके रवाना किया गया था ! सोचा इसी बहाने सबसे मिलना हो जायेगा ! शादी में उल्लास से सब मिले संतोष भैया पहले कह दिए बरात में सबको साथ ही रहना है ! रात को किराये  की कार खाली होने के बाद बारात चली , हम भी चलने लगे ! संतोष भैया के चेहरे पर संतोष के भाव थे ...! उनसे हम सब ने पूछा की भैया घोडी काहे नहीं मंगा लिए ! संतोष भैया बोले , अरे अब घोडी पर बैठने लायक बचे ही कहाँ , सारा पौरुष तो सिविल सेवा की तयारी ने हर लिया और पौरुषहीन पुरुष को घोडी पर बैठने का अधिकार नहीं है ! बड़े पते की नैतिक बात कह गए संतोष भैया , काश नैतिकता विहीन नेताजी  भी इस विचार से परिचित हो जाते ! जय हो ...दादुर भैया की

बुधवार, 28 नवंबर 2012

अहिवरन देशभक्त

अहिवरन , इस नाम के शब्दार्थ पर जाने की अधिक आवश्यकता नहीं है ..हाँ , लेकिन इतना ज़रूर जान लीजिये की ये राष्ट्र निर्माण के नाम पर शहीद होते-होते ज़रूर बचे ! अहिवरन को बचपन से बड़ा मलाल था की कैसे देश की सेवा करें?? सेना में शरीर धोखा देता था , पुलिसिया रॉब चहेरे  पर फबता न था , और अधिकारी बनने का सपना देख कर कोई गुनाह नहीं करना चाहते थे ! बस फिर भी राष्ट्र निर्माण का अभूतपूर्व संकल्प लिए बैठे हुए थे ! शादी की अतरिक्त योग्यता थी नहीं , और पूर्ण कालिक प्रचारक बनने से सख्त परहेज़ था ! जवान कुंवारा अहिवरन रात तक फ्री टू एयर चेनल तलाशते-तलाशते एक योगी चेनल पर रुक गया ! बाबा ने संवाद किया क्या तुम देश भक्त हो ??? बरबस ही सब बोले हाँ , तुम भारत माता की सेवा करना चाहते हो ?? प्रतिउत्तर मिला हाँ , क्या देश द्रोहियों का नाश करोगे ?? सामूहिक उत्तर हाँ ! फिर बाबा ने निरोगी काया और राष्ट्रनिर्माण का संयोजन कर अट्टहास लगाया ! अहिबरन बाबा की बातों में आगये जैसे रावण की माया के सम्मुख सीता ! बाबा ने कहा की गरम पानी से नहाने से धातु क्षय होता है , नपुंसकता आ जाती है , अहिवरन के चहेरे पर चिंता की लकीरें खिंच गयीं , सोचा मैं कैसे परीक्षण करूं.. ? साधन तो कोई उपलव्ध न था लेकिन नपुंसक होने खतरा ज़रूर डराने लगा ! क्योंकि गरम पानी से पता नहीं कितनी धातु का क्षय हो चुका होगा ?? इसी मनन में तडके ठन्डे पानी से ठण्ड में नहाने के लिए आतुर हो गए ! सोचा की अब तक अनजाने में जो गलती हुयी सो तो ठीक है लेकिन आगे नहीं होने दूंगा ! क्योंकि राष्ट्रनिर्माण में भले ही सीधे योगदान न दे सका तो क्या हुआ लेकिन दो-चार कुचल मानव संसाधन देकर तो योगदान देकर तो राष्ट्रनिर्माण कर ही  सकता हूँ ! न्यूटन के पिता को भले कोई नहीं जानता लेकिन न्यूटन को तो दुनिया जानती है ! बस इस राष्ट्र निर्माण के पुनीत कर्म को करने के चक्कर में सीधे बाथरूम में ऊर्जा से लवरेज होकर घुसे ! ठन्डे पानी को डालते ही करंट सा लगा साध न पाए धप्प  से गिरे शरीर अकड़ गया ,मानो  जान ही निकल गयी ! प्रकृति के कई प्रकोप एक साथ टूट पड़े , अहिवरन सुबह -सुबह अस्पताल में टांग उठाये पड़े मिले ! बोले बस राष्ट्र निर्माण क प्रयास है सो इसे जारी रखना है नहीं तो देश हमसे क्या कहेगा ! की यहाँ कितने आस्ट्रेलिया बने जा रहे हैं और तुम उसमे एक ईंट भी नहीं लगा सके !!!